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अमेरिकी धमकियों के बीच भारत-ईरान संबंधों में नई गर्माहट

SCO शिखर सम्मेलन में पीएम मोदी और ईरानी राष्ट्रपति की अहम मुलाकात

बिश्केक, किर्गिस्तान:अमेरिका की ओर से ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर प्रतिबंध की धमकियों के बीच भारत और ईरान के बीच संबंधों में एक नई गर्माहट देखने को मिली है। सोमवार को किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान के बीच द्विपक्षीय बैठक हुई, जिसने दोनों देशों के रणनीतिक संबंधों को नई दिशा दी है।

Photo: Prime Minister's Office (PMO), Government of India

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

भारत और ईरान के संबंध सदियों पुराने हैं। दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक, भाषाई और व्यापारिक संबंध रहे हैं। फारसी भाषा का भारतीय संस्कृति पर गहरा प्रभाव रहा है और मुगल काल में यह दरबारी भाषा थी। आधुनिक समय में भी दोनों देशों के बीच कई महत्वपूर्ण समझौते हुए हैं, जिनमें चाबहार बंदरगाह विकास परियोजना प्रमुख है।

हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका द्वारा ईरान पर लगाए गए प्रतिबंधों के कारण भारत-ईरान संबंधों में कुछ ठहराव आया था। भारत ने अमेरिकी दबाव के चलते ईरान से तेल आयात कम कर दिया था और कुछ परियोजनाओं में देरी हुई थी। लेकिन वर्तमान भू-राजनीतिक परिस्थितियों ने भारत को अपनी विदेश नीति की स्वतंत्रता पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित किया है।

बैठक की मुख्य झलकियाँ
पीएम मोदी के बयान:

प्रधानमंत्री मोदी ने ईरानी राष्ट्रपति से मुलाकात के दौरान स्पष्ट संदेश दिया कि भारत आने वाले समय में ईरान के साथ व्यापार का दायरा बढ़ाना और उसमें विविधता लाना चाहता है। उन्होंने कहा कि भारत पश्चिम एशिया में स्थायी शांति सुनिश्चित करने के सभी प्रयासों का समर्थन करना जारी रखेगा।

पीएम मोदी ने अपने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पोस्ट में लिखा:

"बिश्केक में राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान से मुलाकात हुई। हमने ईरान के साथ भारत की पुरानी दोस्ती को अलग-अलग क्षेत्रों में और मजबूत करने के अपने संकल्प को दोहराया। हम आने वाले समय में अपने व्यापार के दायरे को बढ़ाना और उसमें विविधता लाना चाहते हैं। हमने क्षेत्र के मौजूदा हालात पर चर्चा की। भारत स्थायी शांति सुनिश्चित करने की दिशा में की जा रही सभी कोशिशों का समर्थन करना जारी रखेगा।"

ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने भी इस मुलाकात को दोनों देशों के संबंधों में एक महत्वपूर्ण कदम बताया और भारत के साथ संबंधों को और मजबूत करने की इच्छा जताई।

अमेरिकी प्रतिबंधों की पृष्ठभूमि

यह बैठक ऐसे समय में हुई है जब अमेरिका ने ईरान के साथ व्यापारिक संबंध रखने वाले देशों को कड़ी चेतावनी दी है। अमेरिकी प्रशासन ने साफ कहा है कि ईरान के साथ किसी भी तरह के व्यापार या आर्थिक सहयोग पर प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। इसके बावजूद पीएम मोदी ने ईरानी राष्ट्रपति से मुलाकात करके स्पष्ट कर दिया कि भारत की विदेश नीति किसी दूसरे देश के दबाव में नहीं चलती।

विशेषज्ञों के अनुसार, यह मुलाकात भारत की **"स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी"** (रणनीतिक स्वायत्तता) को दर्शाती है, जहां भारत अपने राष्ट्रीय हितों को देखते हुए किसी भी देश के साथ संबंधों को आगे बढ़ा सकता है।

भारत-ईरान संबंधों का वर्तमान और भविष्य

**पहलू** | **वर्तमान स्थिति** | **भविष्य की संभावनाएँ** |

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| **व्यापार** | अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण सीमित | व्यापार विविधीकरण और वृद्धि |

| **ऊर्जा सुरक्षा** | तेल आयात कम हुआ | ऊर्जा सहयोग पुनर्जीवित हो सकता है |

| **बंदरगाह सहयोग** | चाबहार बंदरगाह परियोजना जारी | क्षेत्रीय कनेक्टिविटी बढ़ सकती है |

| **भू-राजनीति** | अमेरिकी दबाव में थोड़ी कमी | स्वतंत्र विदेश नीति का प्रदर्शन |

होर्मुज संकट और ईरान की बढ़ती अहमियत

वर्तमान में होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में बढ़ते तनाव के कारण ईरान की रणनीतिक अहमियत और बढ़ गई है। होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के कुल तेल आपूर्ति का लगभग 20% हिस्सा संभालता है। इस क्षेत्र में किसी भी अशांति का सीधा असर भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ सकता है।

इसलिए, ईरान के साथ अच्छे संबंध बनाए रखना भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। इसके अलावा, ईरान के रास्ते भारत को मध्य एशिया और काकेशस क्षेत्रों तक पहुंच मिल सकती है, जो कि **"इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर" (INSTC)** परियोजना का हिस्सा है।

चाबहार बंदरगाह: भारत-ईरान संबंधों की रीढ़

चाबहार बंदरगाह परियोजना भारत-ईरान संबंधों की धुरी है। यह बंदरगाह न केवल अफगानिस्तान और मध्य एशिया के लिए भारत का गेटवे है, बल्कि यह पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह का विकल्प भी प्रस्तुत करता है। अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद भारत ने इस परियोजना में अपनी रुचि बनाए रखी है और आने वाले समय में इसे और तेजी देने की संभावना है।

क्या भारत अमेरिका की धमकियों की परवाह किए बिना ईरान के साथ जा सकता है?

विशेषज्ञ इस मुलाकात को भारत की स्वतंत्र विदेश नीति का सबूत मान रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने कई मौकों पर स्पष्ट किया है कि वह एक संप्रभु देश है और उसकी विदेश नीति राष्ट्रीय हितों से संचालित होती है।

हालांकि, भारत को अमेरिका के साथ अपने बढ़ते रणनीतिक संबंधों (जैसे QUAD और रक्षा सहयोग) को भी संतुलित करना है। इसलिए भारत की चाल सावधानीपूर्ण होगी, लेकिन यह मुलाकात निश्चित रूप से इस बात का संकेत है कि भारत अमेरिकी दबाव में झुकने वाला देश नहीं है।

निष्कर्ष

  • प्रधानमंत्री मोदी और ईरानी राष्ट्रपति के बीच यह मुलाकात न सिर्फ दोनों देशों के संबंधों में एक महत्वपूर्ण मोड़ है, बल्कि यह बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत की बढ़ती भूमिका को भी रेखांकित करती है। अमेरिकी धमकियों के बावजूद भारत का ईरान के साथ संबंध मजबूत करना इस बात का प्रमाण है कि भारत एक **"विश्व मित्र" (Vishwa Mitra)** की भूमिका निभाने के लिए तैयार है।
  • आने वाले समय में भारत और ईरान के बीच व्यापार, ऊर्जा, बंदरगाह विकास और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ने की संभावना है। यह सहयोग न केवल दोनों देशों के लिए फायदेमंद होगा, बल्कि पूरे पश्चिम एशिया क्षेत्र में स्थिरता और शांति लाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
  • यह मुलाकात भारत की परिपक्व और आत्मनिर्भर विदेश नीति का प्रतीक है, जो संकट के समय में भी अपने हितों की रक्षा कर सकती है।

अस्वीकरण (Disclaimer):

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Posted By:- K.D. Vishwakarma

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Source: Social Media

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